6 December 2007

निशान

गीली रेत पे पायो के निशान
हाँ, मिट जायंगे,
सागर की इक लहर के संग
पर उन चिह्नों का क्या?
जो दिल पे छाए, बन अंधेर साये
नही मिटते अशरुओ के संग
ओर गहरे हो, ड़सते सारी रात
क्या है कोई ऐसा सागर
जो मिटा दे ये निशान...


कीर्ती वैद्य....

4 comments:

Asha Joglekar said...

अच्छी कविता । समय का सागर ही ऐसे अंधेरे निशानों को धुंधला कर सकता है ।

राजीव तनेजा said...

सुन्दर कविता...

समय पुरानी यादों को बेशक भुला ना सके लेकिन धुंधला ज़रूर कर देता है ...

लिखती रहें

36solutions said...

सुन्‍दर कविता । वाह ।

आरंभ
जूनियर कांउसिल

Anonymous said...

good words so true