अपने आस-पास जो महसूस करती हूँ.....शब्दो में उन्हे बाँध देती हूँ....मुझे लिखने की सारी प्रेणना, मेरे मित्र नितिन से मिलती है.... शुक्रिया नितिन, तुम मेरे साथ हो....
11 February 2008
सेल- दिली की
दुकानों में सेल का वायरस फैला,
इधर- दौड़, उधर-देख, जिधर देख,
भारी गिरावट का सुचांक टंगा,
महिलाये के संग, बच्चो का भी बोलबाला,
ले लो मैडम, ५०% ड़िसकाउंट ओर कंहा,
आपकी साड़ी के संग, नैल्पोलिश बस यंहा
गोल्ग्पे फिर , पहले ७०% सेल का ले मज़ा
बेचारे पतिदेव, बजा उनकी जेब का बाजा
अरे न डरो, क्रेडिट कार्ड जो है धरा
दिलवा दीजे, वो गर्म लाल दुशाला
ओर चुनू का मनपसंद कला चश्मा
रोज़-राज़ नही लगती सेल ऐसी भइया
तों काहे खडे सुन रहे, मेरी माने
आप भी चले भागे आये दिली....
कीर्ती वैदया..
ऐ रंगरेज .....
ऐ रंगरेज .....
सब रंग हैं न तेरे पास .......
भर दो पीत मेरे बचपन को
बाबुल के संग जब मैं रहती हूँ
इठलाती इत उत जब फिरती हूँ
रोती माँ है मैं जब गिरती हूँ
फिर बाबु जी की गोदी होती हूँ
ऐ रंगरेज .....
भर दो नील मेरे अल्हर्पण को
जब मैं तितली सी उड़ती हूँ
ले बलाएँ दादी कहती है
कैसी सुंदर नील परी हूँ
ऐ रंगरेज .....
भर दो गुलाबी मेरे यौवन को
जब मैं यादों का पनघट हूँ
टूटे फूटे सपनों का अम्बर हूँ
धुंधली भूली टूटी खंडहर हूँ
ऐ रंगरेज .....
हर लो न यह कला रंग
मैं फिर जीना चाहती हूँ
वह बचपन के छोटे मोटे पल
जब दुनिया अच्छी है मैं भोली हूँ .....
ऐ रंगरेज .....
दे दो न मुझको यह हरा रंग
बोलो न .....
क्या दोगे मुझको अपना इन्द्रधनुष ...
ऐ रंगरेज .....
कीर्ती वैद्य
6 February 2008
याद है, तुमहें......
जाड की बेरंगी शाम
दौडते शहर की सड़क
चुपी के चादर ओढ
घंटो मेरा इंतज़ार
याद है, तुमहें......
मोल-तोल के पीछे
ठेलेवाले से बहस
मेरे हंस जाने पर
आप ही झेंपना
याद है, तुम्हे......
वो हाथ पकड़ घूमना
बच्चों को खेलते देखना
और कल्पना की उडानें भरना
ताने बने बुनना
याद है तुम्हें ......
वो छोटी मोटी बातें
वो लड़ना झगरना
वो तुम्हारा मनुहार
और मेरा मान जाना
याद है तुम्हें ......
वो शाम बीते
कई बरस होए
स्मृतीपटल के
चीत्र, शेष अब
हाँ, अब कंहा याद, तुमहें......
मैं न रही
ये भी न होंगे
शेष कभी......
कीर्ती वैद्य...
4 February 2008
मैडम से भीखारन
सीट मिलगी, तो मैडम टिकेट लेगी
वर्ना, खडे होने की एवज मे, मुफ्त जाएँगी...
कंड़कटर भि कम ना निकला
ड्राईवर को दे निर्देश, जोर से बोला...
अब गाड़ी का ब्रेक , सीधा अपने घर जा लगेगा,
आज मैडम हम संग मुफ्त जाएँगी......
मैडम के तेवर हुए अब तीखे
सवारियों को संबोधित कर बोली
भला अब गुंडागर्दी बस मे चलेगी
अकेली जान समझ, छूरी मुझपे चलेगी
अरे, नहीं जाना तेरी बस मे भईया
रोक अभी रोक, अभी मुझे उतरना ....
वाह मैडम जी, आप भि कमाल करती
टिकेट माँगा तो बदमाश लगे
घर ले चले तो भाई लगे
काहे को चलाती हो हमे
दस का टिकेट तो है
चुपचाप काहे नहीं लेती हो
वर्ना, हम भि कम नहीं
मैडम से भीखारन का खिताब
अभी आपको देते है.....
कीर्ती वैद्य...
ज़िन्दगी के पन्ने....
बस अपना-अपना किरदार निभाना होता है
उसके अनुसार अपने को ढालना पड़ता है
कभी मस्त- कभी बेकार लगे रोज़ का नाटक
क्यों नहीं कोई फाड़ देता इन पन्नों को
या फिर ख़त्म हो अपना किरदार, यंहा पर
कीर्ती वैदया.............
31 January 2008
मूक सवाल
जब भी ढ़ूंढ़ा , तुम्हारी गहरी आँखों में
उलझी रह गयी, तेरी खामोशी में......
ें
हो सकता है, तुम कहते तों हो
ओर मुझ तक पहुँचता भी हो...
पर शायद,
मैं सब समझना नही चाहती
ओर तुम कह, रूलाना भी नही चाहते...
कीर्ती वैदया...
सुबह
जब कूकती है ....
तो लगता है मानों ...
आम्र वाटिका मैं
मंजरों की खुशबू है
मदमस्त मन जब
पुलकित सा होता है
तभी ......
नींद खुल जाती है !!
(यह पंक्तिया मेरे मित्र उत्पल मिश्र जी की है)
23 January 2008
छोरा ........
गुथ्मुठ बातो से भरा, छु मेरे मन को गया
हलकी मीठी धुप सा, ज़िन्दगी में रम गया
सलीकेदार सवाल- आप केसी हैं ?
अरे, मुझे फूलों सा खिला गया...
सरसरी बातो में, दीवाना बना गया
तनिक मुलाकातों में, अपना बना गया
सच, वो छोरा मेरा प्यार बन गया.......
19 January 2008
सुनो...
कितना ख्याल तुम करते
सात समुंदर पार भि
रोज़ मुझे याद रखते
हर नन्ही जिद के आगे
रोज़ मुझे मनाते
बच्चों से कहानिया बना
रोज़ सपना दिखा बहलाते
अनकहे दर्द को समझते
चुपके से अश्रु पौंचते
ढेरों अपनापन, इक पल में
मेरी झोली में भर जाते
सुनो, तुम मेरे दोस्त से
हमसफ़र क्यों नहीं बन जाते.......
कीर्ती वैद्य
18 January 2008
जो नहीं अपना....
जो सिमटी मेरी हथलियो में...
क्यों नेनो के सागर में तेरे, वो सपने
जो कैद मेरे दिल में...
क्यों भागे मन, तुम्हारे पीछे
जो बस जुडे ख्याल बन मेरे...
क्यों चुगु सपने, तुमसे जुडे
जो कभी नहीं तेरे-मेरे...
क्यों सजाऊ, रेत के घरोंदे
जो ना कभी हमारा बेसेरा.....
कीर्ती वैद्य..
16 January 2008
चले गए...
फिर इक बार मिले
दुआ-सलाम कर
फिर नासमझ बन गए
मुझे तनहा छोड
फिर आज चले गए
बिन समझे जसबात
फिर रूला चले गए
कीर्ती वैद्य
8 January 2008
जो अब बस तुम्हारा है
जो अब तुमसे बने है
मिटे न कभी अपने फासले
जो अब नज्दिकिया बनी है
टूटे न कभी मन के धागे
जो अब तुमसे जुडे है
बहे न कभी अब आंसू
जो तुमने बांधे है
महकता रहे अब प्यार
जो अब तुमसे मिला है
हर सांस में रहे इक नाम
जो अब बस तुम्हारा है
कीर्ती वैद्य
4 January 2008
जिंदगी अपने घर
सहली से मांग इक कटोरा सावन लायी
बच्चों से मांग भोली मासूमियत लायी
माली से मांग फूलों की क्यारिया लायी
आज अपने दिन को ऐसे ही सवांर
जिंदगी को अपने घर बुला लायी
कीर्ती वैद्य
तुझ संग जीने-मरने लगे ...........
जाना जब तुम्हे सपनो से परे
विश्वास का हाथ थामे
भाग चला जब मन, तेरे पीछे
छोड़ सब रस्मे, बिन पूछे सबसे
तुम संग जब, खाने लगा कस्मे
प्रेम की अंधी सिडियो से आगे
जुनूनी बदलो को पार कर के
जब तुझ संग जीने-मरने लगे ...........
कीर्ती वैद्य........
2 January 2008
कुछ इस तरह.........
दुनिया के भीड़ में, अपने को तलाशती
भरे बाजारों में, अपनी ख्वाशियो को तोलती
नंगी बेहया नजरो से, अपने को छुपाती
कड़वे ज़हर को, चुपचाप कंठ से उतारती
कोने में छुप, अपने पर ही रोती - हँसती
भागती ज़िन्दगी में, अपना ही दम तोड़ती
कुछ इस तरह, वो रोज़ जी लेती
कीर्ती वैद्य
31 December 2007
२००८ की मिस भूतनी का खिताब
इक इन्वीटेशन हाथ आया है
अपने इलाके के मुर्दे ने पुकारा है
न्यू इयर साथ मनाना है,
ऐसा कह मुझे पुकारा है
शमशान घाट मुझे जाना है
लगा लिपस्टिक, सज़ा काजल
मुझे भि चमकना है
चूँकि, चुडेलो का ब्यूटी कांटेस्ट भी
आज रात ओर्गानिस हुआ है
जानती हूँ , कमबख्त चुडेले
राख से तन मन साजेंगी
पर मैं सिर्फ लक्मे लगा ही
अपनी जुल्फों को तेल से निलाहा
रेम्प पर ठुमकुंगी.......
२००८ की मिस भूतनी का खिताब
अबकी बार मुझे ही पाना है
कीर्ती वैद्य
नमकीन
कभी मिठास का एहसास नज़र आता नहीं
सोचती हूँ क्यों करती हूँ हर बात फिर भी
शायद,नमकीन की आदत तुम संग अब मुझे भी
कीर्ती वैद्य
28 December 2007
सूखे पात
उदास मन को दिलाती कुछ याद
किताब से बिखर सुनाती बात
नमकीन बूंदे समेट नम होती आप
सुर्ख फूलों का रही कभी हिस्सा
अब बस बचे यही दिन रात
कीर्ती वैदया
27 December 2007
खिचडी
भोर किरनों का दे छोंका
भरी दुपहरी का उबाला
साँझ हवा का मसाला
इंद्रधनुषी रंगो से सज़ा
निहार रही तुम्की रहा
कीर्ती वैद्य
26 December 2007
कया लोगी.........
तों आप घर बसाए, मैं घरवाली बन जाउगी.......
घरवाली बन, मेरा भेजा खा जाउगी
नही, बस आपकी आज़ादी बांधुंगी
अरे , उड़ने दो मुझे बन आजाद पंछी
रोका कब, बस मेरा हाथ थामे चलना
उफ़, तुम पीछा छोड़ने का कया लोगी
बस, रोजाना खामोशी से शायरी सुनो
याही चाहूंगी...और कया.....
कीर्ती वैदया.
24 December 2007
जब, तुम हमसे रुठोगे
जब, तुम हमसे रुठोगे
गुनगुनाना मेरा बंधेगा
जब, तुम हमसे कटोगे
तुम तो हर बार मनाते हो
पर जब, तुम हमसे रूठे
हम कया तुम्हे मना पाएंगे..
तुम्हे फिर अपने प्रेम में रंग पाएंगे
जब, तुम हमसे रुठोगे
कीर्ती वैदया
19 December 2007
क़ैद
कई दिन बाद कमरे में आना हुआ सब सहजा,
जैसे कुछ बदला ही ना
वही कुर्सी व छनी धूप के कण
मंद हवा से उड़ते फैले सूखे पत्ते
धूल चढी हंसती तस्वीरो का रंग सब धुंधला था,
कुछ शेष था, गूंजती कानो में पुरानी बाते
क़ैद जो मेरी स्मृति में ना कीसी कमरे में....
कीर्ती वैद्य
18 December 2007
कुछ ऐसे ही...
13 December 2007
जानती हूँ, जवाब.....
आर नहीं तो पार होने का संदेसा दिया है
जानती हूँ, जवाब.....
सारे दिए आप बुझा दिए है
अपने दिल को समझा लिया है
जानती हूँ, जवाब.....
तभी तो अपने को जाम में डुबो दिया है
हर लम्हे को आँसुओ से धो दिया है
जानती हूँ, जवाब.....
हर याद को धुएं में उडा दिया है
हर ज़ख्म को दुनिया से छुपा लिया है
जानती हूँ, जवाब.....
अपनी राह को बदल दिया है
अपने वजूद को ही ख़तम कर दिया है
जानती हूँ, जवाब.....
कीर्ती वैद्य
11 December 2007
आँखों का बाँध
मैं क्यों और कौन
कया रखा मेरे पास
चले जाओ यंहा से
बस छाया घुप अँधेरा
न कोई बस्ती न हस्ती
न कोई किनारा यंहा
मत आया करो, भर
नैनो का कटोरा
नहीं मिलती प्रेम भीख
मुझे बहलाने से भी
चले जाओ वर्ना
टूट न जाये मेरे
आँखों का बाँध
कीर्ती वैद्य
अलविदा
दिल नाचे तेरी बात सुनके
पर अब न चलेंगी हवाए ऐसे
न रहेंगी मुलाकाते अब वैसी
कह दिया अब हमने तुमको
अलविदा अपनी धडकनों से भी...
कीर्ती वैद्य
7 December 2007
पहचान
पहचान कया है ?
किस रिश्ते को
दोनों दूर होकर भी
निभाते है?
धरती - नभ को जोड़ने वाला
इक क्षितीज है
चाँद -तारो को मिलाने वाला
इक वायुमंडल है
मेरे-तेरे बीच बस
इक मन का तार है..
कीर्ती वैद्य
रिश्ते
कुछ उलझे कुछ नासम्झे
कभी बनते कभी बंटते
कभी इस डाल कभी
उस डाल झूलते रिश्ते
मैं इक बेपरवाह
कब यह समझी
प्यार के डोर में बंधी
उड़ती रही बन हवा
सोचा कब...
कट जाउंगी इस तरह
उलझ रह जाउंगी
रिश्तो के जाल में इस तरह
कीर्ती वैद्य
6 December 2007
निशान
हाँ, मिट जायंगे,
सागर की इक लहर के संग
पर उन चिह्नों का क्या?
जो दिल पे छाए, बन अंधेर साये
नही मिटते अशरुओ के संग
ओर गहरे हो, ड़सते सारी रात
क्या है कोई ऐसा सागर
जो मिटा दे ये निशान...
कीर्ती वैद्य....
5 December 2007
"बदला इंसान"
खा गया उसे ज़िन्दगी का ज़हर
बन गया इंसान झूठ का पहाड़
कितने भी हंसी के मोखोटे लगाये
दिख रहा बदल गया इंसान...
कीर्ती वैद्य...
4 December 2007
कहानियो का संसार
डूबता उनमे एकाध बेकरार
बस समझे वही इसका अधार
कितना विशाल सरोबार
लगा लो डुबकी एक बार
जान लोगे क्या यह संसार
30 November 2007
अपने प्यार की रस्म
ना जाओ कंही आज
इन आखरी पलो का साथ
तुम्हारी सांसो का एहसास
जी लेने दो अपना यह प्यार
फिर बिखर जायगी,इक काली रात
ना छोडो मेरा हाथ
कुछ पल बाद आप छुट जाएगा साथ
बह जाने दो अपने ज़सबातो को
फिर कौन सुनेगा, मेरे जाने के बाद
ऐसे ना छुपाओ अपनी भीगी पालकी
ना पौछेंगा कोई, मेरे बाद
देखो उस चाँद को, वो सब जानता है
कैसे हममे जुदा होते, तक रहा है
जब आयेगी तुम्हे मेरी याद
तुम भी ऐसे ही चाँद को तकना
मैं काले अम्बर पर भागती आऊंगी
हवा बन तुमसे लिपट जाउंगी
अपने प्यार की रस्म मरकर भी निभाउंगी...................
कीर्ती वैदया...
ज़िंदगी का इक दिन
आँख मिचते अक्स में बदले
अन्बुझे सवालो का अंबार लगा
न जाने कंहा धुयां हो जाए
क्या उनके जवाब
उनमे ही मन घुल जाए
अपनी ही परछाइयो से
आप ही डर जाए
ज़िंदगी का इक दिन
कुछ ऐसे ही बीत जाए...
कीर्ती वैदया...
29 November 2007
फिर पीयेंगे
दोस्त का फ़ोन
क्या मुसीबत है
अभी क्या काम
हम तों शाम
को मिलते है
क्या इसका नशा
अभी उतरा नही?
हाँ, बोलो....
सुनो मेरी बात ,
बुरा न मनाना
अपनी दोस्ती
पे आंच न लाना
सारी रात
सो न पाया
इक शादीशुदा,
बच्ची का बाप
फीर भी न जाने
क्यों तुमसे
दिल लगा बैठा
इक दोस्त से
बढ तुम्हे
अपनी प्रेमीका
मान बैठा
हो सके तों
माफ़ी देना.....
अरे, ये क्या
कहते हो
मेरे दिल मैं
तों ऐसा
कुछ नही
छोडो फालतू
की बाते
शाम को
संग बैठ
फिर पीयेंगे
जाम.........
कीर्ती वैद्या
28 November 2007
भीगे नैन अब........
मिला न कभी तब
आस भी छुटी सब
तक-तक हारी जब
बुझ गए दीप
तों खडे अब
भीगे नैन अब........
कीर्ती वैदया.....
एहसास क्यूँ रहे.....
क्यूँ रोज़ करे तंग
सुर्ख होंठो की लाली
क्यूँ जलाती रात भर
खनकती चुडियो का रंग
बरसाए नैन सारी रैन
हाँ, वो अब साथ नही
फिर, एहसास क्यूँ रहे.....
कीर्ती वैदया
मेरा ही रहे
मेरी भी सहेली
बड़ी इठ्लाये पीया पे
छमक-छमक देखो
ज़लाये-चिडाये
इक दिन पूछा
ऐसा कया उसमे?
लगी इतरा पिरोने
तारीफों की लड़ी
सुन सब, मैंने
अंगूठा दिखलाया
अरी, बड़ा दूर
वो तुझ से
न जाने कितनों
का सजन, तेरा सनम
भला मेरा 'माही'
तेरे चाँद से सही
कितने पास मेरे
दिन -रात, हर
पल संग मेरे
कोई नहीं देखे
मेरे सिवा उसे
बस 'माही' मेरा
मेरा ही रहे
हमेशा के लीए
किर्ती वैदया............
रोज़ बहाना बन
आँख खुले पास खडे होते हो
सात समुंदर पार गए हो
फीर भी, मुझे याद रखते हो
सुनु, क्यों नहीं सोते तुम
जब सूरज नीकले यहॉ
तुम रात अपनी क्यों जलाते
सारी रात जग बात करो तब
जब रात पसरे मेरे यहाँ
सपनो में चले आते हो तब
'कीरू' को इतना क्यों चहाते हो
उसे क्यों इतना सताते हों
जब रहना ही अलग हमे
तो क्यों रोज़ बहाना बन
मिलने भागे आते हों........
कीर्ती वैदया...
27 November 2007
प्यार कया चीज
कभी हंसाये
कभी रुलाये
मीयां, पर तुमहारा
यहाँ कया काम?
ये न कोई बाज़ार
न बीके यंहा प्यार
मोल-भाव में तोल
न करो अपमान
रहने दो पाक.
कीर्ती वैदया....
नन्हा सपना
इक रोता नन्हा सपना
न सूर्ये कीरण छुए
न रात चांदनी
हंसा पाए
कई दीन का भूखा
सुस्त चाल लीए
खामोश धड़कन
भी रो जाए
दस्तक सुन, आस लीए
इक सांस में, हंस जाये
न पा, फीर मुरझाये
गुमनाम, फीर
जीए चला जाये.....
कीर्ती वैदया..
याद है, तुमहें......
ऐसा कोई रंग है?
पुछा जब रंगरेज ने...
खो गयी खड़ी-खड़ी
बीसरी फीकी यादो में
काश, रंग पाती
अपनी बेरंगी यादो को
फीर एक बार खील
चहक नाच पाती
बाबुल के अंगना
सुनो रंगरेज..
ऐसा कोई रंग है ?
कीर्ती वैदया......
26 November 2007
बादलों के पार
इक ओर जहां
लेकर जाना, तुझे
अपने संग वहाँ
न छुए रौशनी,
न जलाये अब,
न देखे दुनीया,
न सुनाये अब,
बस बाते हो,
अपने दील की
कुछ राते हो
अपने सुकून की.....
कीरती वैधया
15 November 2007
PHOTO OF SHAYAR FAMILY.....GETTOGETHER
2 November 2007
यह भी ज़िंदगी ही है...............


खाली रंगो से भी रंगीन हो जाती है ज़िंदगी
नकली मोखोटो में से भी हंस जाती है ज़िंदगी
उन एहसासों का क्या जो खोये दुनीया की भीड़ में
म्रीग मरीचीका पयास का क्या जो भटके इस भीड़ में
आंखो की हजार चाहते, चंद सीको से जगती कीसमते
मद में चूर उड़ता धुयॉ रात भर टकराते जाम के कांच
पर उनका क्या जो ढ़ूंढ़े बस बेमोल प्यार के दो मीठे बोल
बीस्री अपनी ही यादो को भीगोये अपनी ही बूंदों से।
कीर्ती वैदया............................................
25 October 2007
Ashko mein......
Roz tujhey karey yaad
Tuttey sittaro sey karey swaal
Kab ayega puchey apni baat
Kabhi ise karwat to kabhi use karwat
Tera aks dhundhti badnaseeb ankheey........Its me keerti
15 October 2007
TUJHEY DHUNDTI HAI
Vo pehalye jaisa meetha payar dundhti hai
Khamosh sey mohabaat ke vo zasbaat
AAj bhi tere dil mein dhundhti hai
Tere Hatho ka narm apna sa sparsh
Teri bahoo mein aa aaj bhi dhundti hai
Tere sang gujrey barsaat key vo lamhey
Aaj bhi barsat mein bheeg, tujhey dhundti hai.............
Its me Keerti Vaidya
12 October 2007
MERE SAPNO KA BHARAT
APNEI SABKI CHAT PAYARI HO
MILEY SABKO SIKSHA EK SAMAN
NAR-MARI KA NA BHED HO
KAAM KAREY SAB MIL EK
NA HO KOI RAJA NA KOI RANK
ROZ BANEY ID-DIWALI
NA HO KURSI KI KHEENCH TAAN
ASA HE HO "MERE SAPNO KA BHARAT"
11 October 2007
KYUN DIL KEH REHA ......
SIRF AAJ TERE HE NAAM KA JAAP KARU
DAAMAN BHAR GAYA HAI TERE PAYAR SEY
ANKHEY NAAM HAI TERE ISE EHSAAS SEY
CHUPA LO BAS AB APNEY SEENEY MEIN
JEE LANEY DO BAS AB APNI BAHOO MEIN
BHUL JANEY DO SAREY GUM ISE JAHAN KEY
DOOB JANEY DO MUJHEY APNEY NASHEY MEIN........ITS ME KEERTI
10 October 2007
Kyun
Kabhi raha chaley pukartey ho
Kabhi mandir ke pass kadhey hotey ho
Khamoshi ko udhey bhi kuch bol jatey ho
Kyun yun tukar-tukar nihartey ho
Kya raaz chupa rakhey ho..................its me keerti
9 October 2007
na janey kab sab kho gaya
Ghaney kaley megha ban asma mein cha gaye
Chehketi koyal se boli kab muk ho gayi
Andheri se kaal kothri se chupi cha gaye
Udti rangeen titliyo se chuhalbul sab band ho gayi
Tanhayio ke alam me ek koney ja beth gaye
Inderdhunshi rango ka banaya payara gharonda tut gaya
Zindagi ke bereham bhav mein na janey kab sab kho gaya...
Its me Keerti
8 October 2007
Bheegi the mein uskey payar mein
Jo aap bheega tha kisi aur ke yaad mein
Kitna hansta tha vo mujhey
Jo aap rota tha kisi ar ke payar mein
Zindagi ka arth samjhata tha
Jo aap sab kho chuka tha ise jahan mein
Haath pakad jisney jeena seekhya
Jo aap jeena bhula tha kisi aur ke saath na honey mein
Its me keerti
EK ANJAAN AJNABI
BIN DEKHEY HE USSEY PECHANTI HUN
BARISH KE NAM MEETHI BOONDO SA VO
BHORE KE PEHALI CHALKI KIRNO SA VO
GUNGUNATA HAI GEET BAN MERE HONTHO PEY
DHADKHTA HAI DIL BAN MERE SANSO PEY
KABHI CHU JATA HAI BAN PAWAN MERE MAAN KO
KABHI HANSA JATA HAI BAN SHABNAM MERE DIL KO
KABHI NACHTI HUN USKEY PAYAR MEIN BAN RADHA
KABHI GAATI HUN USKEY EHSAAS MEIN BAN MEERA
ITS ME KEERTI







