12 December 2008

दर्द

कुछ ढका कुछ छुपा सा

गुमसुम बूंदों से तरा सा

झुरमुट मेघो से घिरा सा

शायद ............कोई

दिल में छुपा दर्द रहा

जो, कभी बह ना सका

बस, चहरे पे उमड़ गया....

कीर्ती वैद्या ....११/१२/2008

12 November 2008

आंसू

एहसासों के ताने बाने लिपटे

चाँद तारो को एकटक तकते

बिन कदमो बिन आहाटो के

मीलो दूर बेवजह घुमे आये

सुबह, सब बिखरी औंस देखे

हम अपने खोये आंसू पर हँसे.....

कीर्ती वैद्य....11th nov'08

22 August 2008

सुबह मुबारक

मीठी-मीठी,
प्यारी-प्यारी
बूंदों में भीगी
नीर बदरा भरी
सुबह मुबारक ....

कीर्ती वैद्य

16 July 2008

शहर

जी, यह शहर बहुत अजीब है...
चाँद छुपने से पहले जग जाए
रात के अलसाए खाव्बो को, किनारे रख
दफन ज़िन्दगी के बासी अफसानो को
अखबार की सुर्खियों में ढूंढता है ...

जी, यह शहर बहुत सख्त है...
इंसानियत का मखोटा उतार,
साहब तो कभी गुलाम नामक
इक प्लास्टिक लेबल चिपका
पेट की बेबस भूख तो कभी
दुनियादारी के रिवाजो के लिए
झूठ के आगे आँखों का पर्दा खींच,
सेंकडो सच डकार जाता है
भीगी बिल्ली बन खोखली हंसी हंस
ना जाने कितनो के सपने डसता है...

जी, यह शहर कुछ नमकीन है...
अपनी ख्वाशियो के छल्ले, धुएं में उडाता
ज़िन्दगी बस इक कड़वा घुंट, यही समझ
हर शाम, अपनी बेहयाई का जाम गटकता
तंग गलियों से कभी गुजरे तों,
बेबस हालातों पर सिसक जाता है
कभी, भरे बाज़ार अपनी ही नीलामी पर,
लाचारी-बेबसी का मातम मनाता है

जी, यह शहर फिर भी अपना है ...

कीर्ती वैद्य....10/july/2008

9 July 2008

आखरी दम....

दरवाजे पर दस्तक हुई
इक नहीं, दस बार हुई
सोचा खोले ... पहले इस
सिगरेट के टुकडे का
दम तो भर ले,
कंही बहार खडा तूफान
इस आखरी साथी को
संग ना बहा ले जाए
कुछ पल जो बचे, बस
धुएं के संग धुयाँ हो जाए
फिर बस राख बचेगी
डर नहीं ...कोई भी
बिन दस्तक दे ही
हमे फ़िर पुकार ले .....

कीर्ती वैद्य ... 09 july 2008

कड़वा सच ....

सुना और परखा

हाँ....सही

सच, कड़वा था

खिड़की से झांकता

मुँह चिडाता सा

पर .... हाँ

इक और सच था

ये कड़वा, मीठा लगा

सब ...जैसे

बन्धीशो से मुक्त था

ना थी कोई बेचेनिया

ना कोई इंतज़ार रहा

खुल गया, हाँ पिंजरा

उड़ा रहा अब मनवा

दफ़न कुछ था, रहा

बिफरा, पर फर्क था

अब ... आज

आंसू भी मीठा लगा....

कीर्ती वैदया ०९ जुलाई 2008

8 July 2008

सोचते है तुम्हे ........

अक्सर सोचा करते है, तुम्हे

सुबह-शाम .... सोते - जागते

डायरी को शब्दों से भरते

कभी....किसी किताब के

पन्नो को पलटते - पलटते

उड़ती नीली-पीली पतंगों के

धागों से उलझते हो, सोच में

सोचते है ...क्यों सोचते है सोचते

जंगली कंटीले बेंगनी फूलो से

अक्सर चुभ जाते हो, सोच में

कई बार सोचा....दूर रखे तुम्हे

इस बेमतलबी सोच के दायरों

से गर्म हथयलियो पर बर्फ पिघले

ऐसा कुछ महसूस कर रुक जाते

टिमटिमाते दियो को इकटक देखे

तो ना जाने क्यों आंसू बन छलक जाते

सोचते है....क्या तुम भी सोचेते हो

जैसे हम सोचते है, हर घडी तुम्हे ......

कीर्ती वैद्य 08 JULY 2008

17 June 2008

आसमां का सिंदूरी रंग ....

हाँ, उस शाम मिलूँगी,
जब थक फीका सूरज,
सागर के आगोश में
उतर रहा होगा
तब ....
लहरों में अब सी बेचैनिया नहीं
हाँ, शिकन की रेखाए जरुर होंगी
टूटे घरोंदे की रेत
नए मुसाफिरों की
राह तक रही होगी
शायद ... फ़िर ... तब
मैं तुम्हे मिलूं
इक बार फिर
पुरानी जिद्द करूं
अबके दिलवा दो
वो आसमां का सिंदूरी रंग ....

कीर्ती वैद्य .....16 june 2008

12 June 2008

रंग

रंगो के गुच्छे
हरदम संग रहे
कुछ पलकों तले
कुछ मुट्ठी धरे
कुछ चलते चलते
चुगु भूरी ज़मी से
कुछ तोड लाऊं
अलसाए आसमां से
कभी टकरा जाए
सागर के सीप में
कभी नदिया की
जलातारंगो में
कभी आहट दे
पंछीयो के करलव में

जानते हो क्यों .....

सब रंग चुरा
सजाया अपना
इक आशिया
तुम्हे रखूंगी
अपने पास
बस वंहा
अपने प्यार के
सब रंग
सह्जुंगी वंहा .........

कीर्ती वैद्य ..... १२ .जून .२००८

9 June 2008

सोच

सोच....बहुत हद तक ले डूबे

कभी ....
मन के अंधियारे गलियारों के
अनजान रास्तों के फेरे काटे

कभी ....

निर्झर झरने के नीर सी भागती जाए
राह की चट्टानों से टकरा, छलक जाए

कभी....
नील अम्बर को बन पतंग छुना चाहे
कटने के डर से धरा का रुख कर जाए

कभी ......
नटनी बन सुतली पर कलाबाजी खाए
चोट के भय से बच्चों सी तड़प जाए

हाँ, इक सोच ना जाने कितने आसमां दिखाए

कीर्ती वैद्य .......09 june 2008

7 June 2008

तन्हायिया




रेशा-रेशा डूबा अपनी ज़िन्दगी का
कमबख्त, तेरी बर्फ जैसी बातों से
रोते है, तो अब आंसू भी नही गिरते
पथराई, इन सुखी- फूटी आँखों से
कोरे कागज़ भी अब हमसे उब गए
इस बेबस दिल की लिखी बातो से
थक बैठ गयी, यह बेरंग ज़िन्दगी
रुखे फीके बेहाल एहसासों तले
बस .... अब सन्नाटो में बाते करे
हम....बस अपनी तन्हायियो से ...........

कीर्ती वैद्य .....16 may '2008

6 June 2008

अकेले

खुश हूँ .... अकेले ही
यादे कुछ अब भी
उनकी, मेरे .... संग है
हर सुबह बन ताज़ी फिज़ा
जिस्म में ..... उतर जाए
चाय के ठंडे प्याले में
तुम्हारी गर्माहट .... घुल जाए
दौडते-भागते बेबस शहरी भीड़ में
बाते तुम्हारी ..... महफूज़ कर जाए
सांझ के चाँद से पूछ हाल तुम्हारा
क्यों तुम दूर ...... हम लड़ जाए
तकिये तले छुपा सब खाब्वो को
तुम्हारे अरमान ....ओढ़ सो जाए
नहीं कहते कभी किसी से
हम बस .....तुम्हे याद कर
हर दिन यूँही अकेले जिये जाए ...
कीर्ती वैद्य .....01 june 2008

22 May 2008

नितिन के लीए....

उस सोच से तुम परे हो
जिस सोच से तुम मेरे हो

तपी तपी गीली पीली धूप तले
मीठे मीठे तेरे कुछ एहसास खड़े

इस पल उस पल ज़िंदगी
बस सब तुम संग ज़िंदगी


होता है होता है....हाँ होता है
राहे जब जुदा ओर मंजिले एक हो

कीर्ती वैद्य

14 May 2008

समझो.....

आस सच्ची
उम्मीद कच्ची

फिर केसे...

पलकों दबे सपने
होंठो से कह पाते

कभी...समझो...

ठंडे जमे बर्फीले
शब्दों की चुभन
खाली
कोरी फीकी
आँखों की चाहत ...

कीर्ती वैद्य ....१४ मई २००८

तुम्हे....लिखूंगी......

तुम्हे....लिखूंगी
इक दिन, पक्का
जब.. शाम उतरेगी
उदास झरोखे में

अभी...

उमस दुपहरी में
अपनी बाहों में
सिमटने जाने दो
मीठे प्यारे
एहसासों को
सुने आँचल में
भर जाने तो दो.....

कीर्ती वैद्य ....१४ मई २००८

12 May 2008

केसे रोक पाती ....

सोचा, पास रख लूँ
अभी यंही...बस
अपने पास रोक लूँ

मन था...
बच्चों सी जिद लिए
शब्द थे ..
भावनाओ से जड़े, निरे गूंगे

फिर केसे सब कह देती
उससे जाने से रोक पाती

रोना......
शायद, जानती नहीं
मरुस्थल में बरसात
कभी देखी है
सब सुखा बंज़र
काँटों से भरा

फिर केसे रोक पाती ....

कीर्ती वैद्य ...... 12 may 2008

8 May 2008

लकीरे

कुछ आढी टेढी लकीरे
पन्ने ख़राब करती

कुछ टेढी मेढ़ी लकीरे
रास्ते बना जाती
कलम खींची लकीरे
कविता कहला जाती
कुछ हाथ की लकीरे
बदनसीबी से नसीबी
नसीब की लकीरे
उम्मीदे बाँध जाती

..........

हाथ की लकीरे
माथे पर शिकन बन
उभर आती है
जब उम्मीद टूट कर
जिन्दगी हाथ से
छूट जाती है......


कीर्ती वैद्य ....२७ मार्च 2008

7 May 2008

स्पर्श ज़िन्दगी का ....

रफ्ता - रफ्ता
बातो की कडिया जुडी
ज़िन्दगी अपना वेग
तेज हवा में ले उडी
जमी पर अब
पाओ कंहा रहे
गीतों की नदिया
जैसे बह चली
परिचय हुआ मात्र
धडकनों की चहातो का
पर स्पर्श जैसे अपना
ज़िन्दगी से हो गया....


कीर्ती वैद्य....1st April 2008

मेरी ज़िन्दगी मिल गयी....

मुझे लिखने की इक वजह मिल गयी
उन्हे गुनगुनाने की अब आदत हो गयी
ज़िन्दगी अब अपनी सुन्हेरी हो गयी
सुबह भी अब अपनी सतरंगी हो गयी
राते भी अब अपन खुशनुमा हो गयी
मुस्कुराने की इक वजह मिल गयी
सजने संवरने की इक तरंग जग गयी
सच, मुझे मेरी ज़िन्दगी मिल गयी

कीर्ती वैद्य ... १७ मार्च 2008

5 May 2008

बस, अब लौट आयो

भोर के दिए
लाल मीठे गुलाब
देखो...
मुरझा
गए
बस, अब लौट आयो...

सावन फिर गया
सुनो...
नहीं भीगना
अब दोबारा
बस, अब लौट आयो...

सज़ा गए, गीली
मेहंदी हथेली
वो...
कबकी सुख
मुरझा झर गयी
बस, अब लौट आयो...

अंगना वही, जो
महकता जो तेरे
गीत गुंजन से
सोच...
तप रहा
अलसाई धूप आँचल तले
बस, अब लौट आयो

काजल की सारी नमी
उतर आयी नयनो में
देखो ना
सांझ हो गयी
बस, अब लौट आयो

कीर्ती वैद्य... ०२ मई २००८