14 July 2007

फुर्सत

चलते चलते आज "फुर्सत" से मुलाकात हुई
मैंने पुछा और भाई केसे हो, आज केसे टकरा गए
हमसे मीले तो ज़माने हो गए................
कुछ गंभीरता से अपना चश्मा सम्भाल बोला
आजकाल मेरी माँग कुछ कम है
कोई मुझे पूछता कहॉ है
जब कीसी का दरवाजा खटखटकाऊ
जवाब मीले इतवार आना
आज ब्डे काम है.............
अरे हाँ दोस्त, मुझे भी इतवार तेरा इंतज़ार रहता है............
"फुर्सत" ने एक जोर का कश भरा
यार इतवार भी गया था
जवाब मीला आज भी समय नही है
घर के कुछ छोटे मोटे काम पडे
फीर कभी हो तो चले आना
आज हमे माफ़ करना..............
हा हा, मैं हंस दीया
अच्हा हाँ, ऐसा तो अपना भी हाल है
खेर फीर कभी मील बेठे चाय पीय्गे
आज तो मुझे भी कुछ जर्रुरी काम है
ऐसा केह , मैंने भी "फुर्सत" से मुँह मोडा..........

सच "फुरसत" तो यंही है पर हममे ही "फुरसत" नही ..............

कीर्ती वैदया

2 comments:

Sajeev said...

very nice kirti, yes the thought is very true on todays time, and good to see you writing in devnagri font, its great

Unknown said...

hi di nice thought ya ye kahu ki true thoughts.........par ye kavita kam lagti hai ek lekh jayda par aapko to pata hi hoga ki aajkal aisi hi kavitaoon ka dour hai .............