12 December 2008

दर्द

कुछ ढका कुछ छुपा सा

गुमसुम बूंदों से तरा सा

झुरमुट मेघो से घिरा सा

शायद ............कोई

दिल में छुपा दर्द रहा

जो, कभी बह ना सका

बस, चहरे पे उमड़ गया....

कीर्ती वैद्या ....११/१२/2008

4 comments:

vijay kumar sappatti said...

dear Keerti

i read the posts , this one is very impressive . and I enjoyed the poem


Pls visit my blog : http://poemsofvijay.blogspot.com/

Vijay

विक्रांत बेशर्मा said...

कुछ ढका कुछ छुपा सा

गुमसुम बूंदों से तरा सा

झुरमुट मेघो से घिरा सा


आपने दर्द को एक नया आयाम दे दिया !!!

हें प्रभु यह तेरापंथ said...

***FANTASTIC




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"HEY PRABHU YEH TERAPANTH "

राजीव थेपड़ा ( भूतनाथ ) said...

हाँ दर्द तो हर इक बार ऐसा सा ही तो होता है.........है ना....??